विद्युल्लता - समीक्षा

 

 

आत्मिका

 

"विद्युल्लता के स्पन्दन गीत"

 

कहते हैं कि हृदय के तारों पर मानवीय संवेदना के संघात से उत्पन्न आत्मस्वर ही गीत है अर्थात् गीत अपनी आत्मरागात्मिकता में

जीवन का झंकृत स्वर है। अपने चारों ओर मौजूद विषय
, वस्तु, प्रकृति, जीव, जगत की ओर संवेदनात्मक दृष्टि से देखने पर जो स्पन्दन महसूस होते हैं वे गति, यति, लय, स्वर, ताल में निबद्ध हो जावें तो गीत बन जाते हैं लेकिन कभी कभी ये स्वयं यह पूरा बाना पहन कर हृदय में खुद ही उतर आते हैं। लय सुंदरता की चरम विधा है और सुंदरता का सीधा सम्बन्ध हृदय से है। यही लय साहित्य में छंद का रूप धारण करती है। काव्य एवं संगीत विधान के लिए उपयुक्त शब्दों की लययुक्त व्यवस्था का नाम ही छंद है। इस कृति के लगभग सारे गीत भावनाओं, संवेदनाओं और स्वसौष्ठव स्वकीय ले कर उतरे हैं। "जो है जैसा है, यहाँ वैसे का वैसा है।"

'विद्युल्लता', 'विद्युल्लता' क्यों हुई:-

विद्युत का भौतिक जीवन आधार -

मेरी स्नातकीय शिक्षा विद्युत यांत्रिकी में हुई और बाद में मैं विद्युतयंत्री के रूप में सेवा रत रहा। वस्तुतः मेरा अध्ययन, अर्जन और उपार्जन तीनों ही 'विद्युत की मातृछाया' व सुखद आश्रय में रहा। यह विद्युत के भौतिक स्वरूप का सानिध्य भी था। इसी विद्युत के संरक्षण और पोषण में मैं और मेरा परिवार अभी भी चल रहा है। पहले वेतन और फिर पेन्शन के रूप में यह अभी भी जीवन का आधार है। इसकी कृपा हमारी स्नायुओं में बसी है और शिराओं में बह रही है। इस पुस्तक के नामकरण में 'विद्युत' शब्द का समावेश होना उसके प्रति हमारी और हमारे परिवार की ओर से आभार प्रकट करना तथा कृतज्ञता ज्ञापित करना है। अगर में यह कहूँ कि हमने विद्युत को भरपूर ढंग से जिया है तो अत्युक्ति नहीं होगी। विद्युत एक जीवनदायिनी प्रकाशमान लता के रूप में हमारे चारों ओर लिपटी हुई है।

विद्युत का आध्यात्मिक आधार -

विद्युत के आध्यात्मिक स्वरूप का विवरण बृहदारण्यक उपनिषद् अध्याय ३ सातवाँ ब्राह्मण: में आता है - 'विद्युत ब्रेह्मेति'

विद्युत् ब्रह्म इत् आहुः; विदानाद विद्युत्, विद्यात्य एनं पाप्मनः, या एवं वेद, विद्युत् ब्रह्मेति, विद्युत् ह्य एव ब्रह्म।

बिजली की चमक जो बादलों के माध्यम से तब प्रकट होती है जब बादलों में गड़गड़ाहट होती है। बिजली की इस चमक में हम प्रकृति की सुन्दरता को देख सकते हैं। इस प्रकृति की सुंदरता को भी हमें ईश्वर की सुंदरता का प्रतिनिधित्व करने वाला मानना चाहिये। कोई व्यक्ति बिजली की चमक को एक वस्तु के रूप में देखता है। बिजली की चमक बादल के अंधेरे को भेद देती है, वैसे ही चेतना की चमक हमारे अन्तःकरण के अंधेरे को भेद देती है।

विदानाद विद्युत: बिजली रात के अंधेरे में भी सूर्य की अनुपस्थिति के बावजूद अपनी चमक से अंधकार को दूर कर देती है। उसी प्रकार हमारी चेतना की चमक से हम प्रकृति का सौंदर्य और फिर अपनी चेतना ही से परोक्ष में परमात्मा का सौन्दर्य अनुभव कर सकते हैं।

वस्तुतः नारी अथवा प्रकृति को विद्युत की लता के आलोक में देखा जाना प्रकृति के बाह्य सौंदर्य को देखना है। इसी से सृजन कर्ता अर्थात् परमात्मा के सौन्दर्य का दर्शन ही सृष्टि की समग्रता है। जब यह फ्लैश हमारे मन के अन्दर होता है तो हम भीतर-बाहर से चेतना से ऊर्जित हो जाते हैं। पुस्तक के मुखपृष्ठ पर अंकित प्रकृति रूपी नारी के सौन्दर्य को विद्युतीय लता द्वारा प्रकाशित किया जाना इसी का प्रतीक है।

विद्युत का लौकिक, व्यावहारिक और नैसर्गिक स्वरूप –

अपने चारों ओर बिखरी-सिमटी संवेदनाओं तथा प्रेम और प्रकृति के स्पन्दन हृदय में बिजली की लहर जैसा उत्प्रेरण करते हैं। ये स्पन्दन ही यहाँ संकलित हैं।

जैसे विद्युत का उक्त भौतिक, आन्तरिक और आध्यात्मिक स्वरूप तथा उसका जीवन मूल्यों पर प्रभाव वर्णित है। उसी प्रकार इस गीतात्मक कविता संग्रह में तात्विक रूप से परमात्मा का वैभव, प्रकृति का स्वाभाविक सौंदर्य और जन जन के अवचेतन में व्याप्त सुख-दुःख, प्रेम-विरह, राग-अनुराग की रसानुभूति के सूक्ष्मावलोकन करने का प्रयास है।

आशा है आप जैसे अनुरागी प्रिय पाठकों को यह प्रयास पसन्द आवेगा और कृति को आपका आशीष प्राप्त होगा।

 

रामनारायण सोनी

 


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विद्युल्लता-कविता संग्रह- अनुभूतियों का महासागर

 



विद्युल्लता श्री रामनारायण सोनी जी का कविता संग्रह, अनुभूतियों का महासागर, अभिव्यक्तियों का गहन आकाश और संभावनाओं की उर्वर धरा है।

ऋग्वेद से लेकर सभी वेदों, उपनिषदों, भगवद्गीता, श्रीमद् भागवत, कबीर, मीरा और महादेवी का जीवन दर्शन कवि की स्व अनुभूतियों में तदाकार होकर रत्नाकर और रत्नगर्भा के बहुमूल्य रत्नों में गुँथा शोभनीय आभरण बन गया है। भिन्न-भिन्न कविताओं में विविध अनुभूतियों को अनुस्यूत करने में कवि के कलापक्षीय कौशल और निश्चित दर्शन के साथ विचारों की अखंडता भावपक्षीय परिपक्वता दिखाई देती है। कबीर ने भी अपने खंड-खंड विचारों को कहा और श्रृंखला बनती गई। समाज सुधार, उदात्त प्रेम, उदात्त विरह, गुरु महिमा और ईश्वर से साक्षात्कार लक्ष्य तक पहुंचने वाले कबीर कभी-कभी विश्रृङ्खलित हुए ही नहीं। पवित्रता और प्रेम की अंतर्धाराएं उनमें सतत प्रवाहित थी।

इस संग्रह में कवि ने "तुम वरेण्य हो" से आरंभ कर "चल रे जीवन उछल-उछल तक आर्ष सहित आगम-निगम का सार तत्व, गुरु महिमा, प्रकृति की पूजा, धरा की गंभीरता, सागर की गहराई, गगन की नि:सीमता, भौतिक स्नेहानंद और भौतिक कष्टों की अनुभूतियों को कवि ने सहेजा और पाठकों के सामने लीलाओं की सी लावण्यता के साथ बिखेर दिया।

लगभग सभी रचनाओं की विचारधारा का सारतत्व संग्रह की प्रथम कविता "तुम वर्ण्य हो" में खोजा जा सकता है। एक तरह से यह प्रथम इस कविता 'बीज' है। इस कविता में एक भी पंक्ति अवांछनीय नहीं है। सभी उदाहरण देना संभव नहीं है तथापि एक पंक्ति का उदाहरण प्रस्तुत है - तुम ज्ञानमयी - विज्ञान में विद्या के परम प्रदाता हो। तुम में सब है, सब में तुम हो। हो बाहर भी तुम, तुम ही उर में"

"ईशावास्यमिदं सर्वं यद्किञ्च जगत्यां जगत्।"

 ईश्वर की याद आने पर नयनों का अश्रु से भीग जाना आश्चर्यजनक है। किसी प्रसंग को पढ़कर सुनकर यह देखकर तद्रूप की अनुभूति से हम रो सकते हैं किंतु ईश्वर की याद में रोना अनुभूति की नवीनता है।

ज्ञानहीन दृष्टि और दृष्टिहीन काया के संताप से मुक्ति योग्य गुरु द्वारा ही संभव है। "राम का नाम आधार है शीर्षक वाले दो मुक्तकों में एक नवीन प्रयोग दिखा। कहीं एक भजन सुना था - 'जननी बिन पालन कौन करे, माता बिना आदर कौन करे।' माँ बालक की त्राता है और पालक भी किंतु कष्ट कंटकों से बचाव के लिए - 'कौन सहाय करें बिन पनही' पंक्ति में पनही का प्रयोग लीक से हटकर है। जिस संदर्भ में पनही का उपयोग प्रयोग हुआ है, उसे पढ़कर लगता है कि कभी पूरी तरह से अद्वैत में भीगे हुए हैं।

कवि ने प्रकृति और उसके उपादानों को परमात्मा का ही विराट रूप माना है। कविताओं में सौंदर्य के असीम भंडार दिखाई देते हैं। एक कविता 'हे अंशुमान' में सूर्य के स्वरूप का दिव्य वन्दन पढ़कर इसे आधुनिक ऋचा खाने में गौरव की अनुभूति होती है। इस चतुष्पदि की दो पंक्तियाँ ध्यानाकर्षण के लिए पर्याप्त है - "आह्लादित उषा उद्यत है, करने को अभिषेक तुम्हारा/ शीतल मन्द पवन ने आकर सर आगम पंथ बुहारा"। यहां 'आगम' शब्द का प्रयोग भी उल्लेखनीय है। आगम का एक अर्थ होता है वेद वाणी और दूसरा जहाँ आपका आगमन हो रहा है। 'आगम' का श्लेष चित्ताकर्षक है। मंद पवन राह को स्वच्छ कर मार्ग को प्रशस्त कर रही है और आगम अर्थात वेद वाणी भी सूर्य के तेज से ही तेजस्वी हो रही है सौरमंडल और वायुमंडल की युति परस्पर आश्रित है, इस वैज्ञानिक सत्य को इस कविता में कलात्मक रूप प्राप्त हुआ है।

प्रकृति के अन्य उपादान वर्षा, पतझड़, बसंत (ग्रीष्म या शरद नहीं) को जीवन से जोड़कर देखने में कवि के अद्वैत, ईश्वर की सर्वव्यापकता, विश्वरूपता और उसका एकाकीपन आदि के अध्ययन जन्य ज्ञान और अनुभव के दर्शन होते हैं। कवि वर्षा की जल बिंदुओं को मन को भिगोने में मानते हैं अतः छतरी का प्रयोग निरर्थक है। वर्षा होने से बहते पनालों की आवाज में जीवन संगीत और बूँदों

की टप टप में भ्रमरों का गुन्जन खोजने वाली कवि की दृष्टि इन उपादानों में ईश्वर को आरोपित कर रूपकों की सुन्दर सृष्टि कर रहे हैं। प्रकृति का मानवीकरण अत्यंत सुखद है।

 कवि वर्षा और बसन्त के पलों को भरपूर जीने की सलाह देते हैं। क्योंकि इस क्षणभंगुर जीवन में सुख के अवसर कम होते हैं। प्रसाद जी ने भी कहा है - 'सुख चपला सा दु:ख घन में' यहाँ कवि एक दार्शनिक की तरह चिन्तन करते दिखाई देते हैं। मानवीकरण की उदात्तता हमें आकर्षित करती है -

 लोचनों में प्रीत भरकर, मैं खड़ा हूँ देख प्रियवर, क्षितिज तक फैली भुजाएँ कण्ठ का मधुभार लेकर।'

 यहाँ प्रियवर शब्द की ओर देखिए - क्षितिज तक फैली भुजाएँ तो विराट पुरुष की ही हो सकती है तो 'प्रियतम' कौन? कैसा होगा? मुझे ऐसा लगता है कि कवि यहाँ अद्वैत से मुक्त होना चाह रहे हैं क्योंकि अद्वैत सरसता में बाधक तो है। प्रियवर से प्रियतम के बीच की दूरी में जो तड़पन है वही भक्ति का आधार है। भक्त में दैन्यता आवश्यक है। बाबा तुलसी कहते हैं - "तू दयाल, दीन हौं, तू दानी हौं भिखारी।

हौं प्रसिद्ध पातकी की तो पाप पुञ्ज हारी।।"

में तुलसी की दैन्यता साकार हुई है। श्रीमद्भागवत और भक्तिकालीन कवि सूर मीरा रविदास में भी अद्वैत को प्रियतम की प्राप्ति में बाधक माना है।

 निराकार उपासक कबीर भी "दुलहिन गावहुँ मंगलचार, हमारे घर आए राम अवतार"

 

कह कर कहीं ना कहीं अद्वैत्ता से उपराम होना चाहते हैं। तो कभी यदि प्रियवर से प्रियतम तक की दूरी तय करना चाहते हैं। स्वयं की को अकिंचन बनाना चाहते हैं तो यह साधना का अंतिम साध्य ही है।

बसन्त के चित्रों में प्रकृति का श्रृंगार, जग के विरोधाभास, कर्म की गति और जीवन की नश्वरता को पढ़ कर कवि के चिन्तन की विविधता समझी जा सकती है।

'आज नियति ने घुमा चक्र, फिर से नव संसृति रच डाली' में गीता का कवि कर्म योग है तो 'धरा धाम में जो पाया है, धरा यहाँ रह जाना' में दर्शनिकता को सुंदर यमक से उकेरा गया है। कवि प्रकृति को ही परमात्मा का मंदिर मानते हैं।

मैं प्रणाम करता हूँ इन,

हिम आच्छादित शिखरों को

कण-कण इस भूतल का

मेरे प्रभु का यह मंदिर है।

कवि एक कभी अतीत को भूलने की सलाह देते हैं, कभी शुष्क होते मानव हृदय से उत्पन्न होने वाली विभीषिकाओं की ओर पाठक का ध्यान आकर्षित करते हैं।

कवि की दार्शनिक दृष्टि कई नई कई-कई धाराओं में बह रही है। 'चरण दिए चलने को फिर क्यों भर डाले इनमें छाले' में आदमी निकटता को व्यक्त करने वाले उलाहने हैं तो नेपथ्य में देखने की चाह महादेवी जी की याद दिलाती है - लो उसी इतिहास की खुलती परत को देखते हैं। महादेवी जी प्रकारान्तर में यही बात यूँ कहती है - तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस ओर क्या है? जा रहे जिस पन्थ में युगकल्प उसका छोर क्या है?

कई कविताओं में दीपक के रूपक कई - कई रूपों में हमारे सामने है-

अँधेरों से लड़ने वाले, आले के सब दीप बुझे हैं

प्रातः किरण से रो-रो कर, फिर से जीवन मांग रही है' में करुणा की अभिव्यक्ति है।

दो दीपक के माध्यम से भाग्य की विडंबना का चित्रण, यह कविता भाग्यवाद पर कवि के विचार के साथ व्यवस्था पर भी व्यंग्य है -

'जब गड़ा था तन हमारा, एक से थे तेल बाती।एक सी ही ज्योति वह थी, जो हमें आकर जलाती।

नाम भी तो एक ही है, पर मुझे आला मिला है

पर तुझी से अप्सराएँ, थालियां अपनी सजाती।।'

दीपक भी पर पीड़ा की अनुभूति करते हैं, दूसरों के लिए जीने वालों में भी यही पीड़ा होती है। अनुभूति का दार्शनिक रूप भी पठनीय है -

'परवाना जब भी जलता है मुझमें

बुझूँगा और जलूँगा कई बार मैं तो

इसे जिन्दगी तो ना मिलेगी फिर से

इंदौर के रहने वाले कवि श्री सोनी जी मैं इंदौर के प्रति ममत्व के भाव की भी उदात्तता से व्यक्त हुए हैं। गॉंवों से जुदा होने की पीड़ा, उनके बदलते स्वरूप पर चिंता, गांव के बच्चों का अल्हड़पन, अल्हड़पन को व्यक्त करती भाषा और उसके देशज शब्द जैसे - 'पुक-पुक', गजकुंडी, 'चंग - पो', 'लँगडी', 'गधा मार को टप्पो', हिंगुली जैसी मोहित करती शब्दावली मिट्टी से उनके जुड़े होने का विश्वास दिलाती है।

प्रेम में पलों का आदान-प्रदान, प्रिय की प्रतीक्षा, प्रिय की अनुपस्थिति से नि:सार होता है यह दृश्य जगत, स्वयं को परखने के लिए आईने का रूपक एक असंभव में संभानावना के संदेश, विज्ञान-जनित और विकास महाविध्वंसकारी गतिविधियों के बीच हंसा रूपी जीव को पुनः उसकी उत्स की ओर ले जाने का आह्वान, प्रकृति की अमूल्य और अद्भुत दान के बीच मानव शक्ति का व्यर्थता और स्वच्छता प्रेम की अमरता, जिंदगी के उतार-चढ़ाव अतीत की स्मृतियों पर व्यंग्य, स्नेह में समर्पण और द्वैतता की समाप्ति का महत्व, स्नेह की राह पर हुए हादसों का प्रतीकात्मक विवरण, ईश्वरीय प्रेम के अभाव में भौतिक सुखों की व्यर्थता, कष्ट-कंटकों में जीवन के समान खिलाने वाले गुदड़ी के लाल महापुरुषों के माध्यम से आशा का संदेश, पर - पीड़ा और आत्म पीड़ा का साहित्य से संबंध, पीड़ा का मानवीकरण और उनके रूपक, कोरोना महामारी की विभीषिका, कोरोना काल में अन्दर की चीत्कार और बाहरी सन्नाटा आदि से मुक्ति के लिए अतीत को भूलने का आग्रह, मृत्यु पर विलाप, जीव के अनन्त में विलीन होने को प्रतिकों के माध्यम से जिस तरह व्यक्त किया गया है, उन्हें शब्दाकार दिया है। यह शब्दाकार भी शब्दकाश है। ब्रह्म की तरह व्यापक और सुनियोजित। धारा या स्वर, रुदन या आनंद, कहीं भी कोई कवि की वाग्धारा और भावधार विखंडित नहीं हुई है।

संग्रह की किसी कविता पर वेदों का, किसी पर उपनिषदों का, महापुरुषों का प्रभाव व्यंजित है। एक कविता 'गर मैं पागल होता, तो बस तू होता या मैं होता' में श्रीमद्भागवत के अवधूत भरत और राजा रघुवण के संवाद की छाया परिलक्षित होती है। यहाँ मानो कवि ने भरत के चरित्र को स्वयं में आरोपित कर भक्ति, समर्पण और परमात्मा के दर्शन की लालसा को व्यग्रता से व्यक्त किया है। ब्रह्म की सर्वव्यापकता का चित्रण - "सृष्टि स्थिति विनाशानां, है कार्य-कारण वह सभी।" कह कर काल पुरुष के तीनों रूप को एकसार रखने वाला निरूपित किया है। तुलसी ने इसे इस तरह नमन किया है - उद्भव, स्थित, संहारकारिणीं, क्लेशहारिणीं, सर्व श्रेयस्करी सीतां नतोsहं हम राम वल्लभाम्।

ध्वन्यात्मकता और विरोधाभासों ने संग्रह को रोचक बना दिया है।

"तड़ित मजीरा मेघ गर्जना

घनन घनन घन करता गान" है या

"तार वीणा के जगाने

मधुमीत तुन-तुन कर रहा है

गीत गुनगुन कर रहा है

 

सर्वत्र मनोविज्ञान का प्रभाव कविताओं को प्रभावी और प्रामाणिक बना रहा है।

इस प्रकार 'विद्युल्लता' कविता संग्रह कवि श्री सोनी जी की अनुभूतियों का वह कोष है जिसमें अध्यात्म, दर्शन, मनोविज्ञान, क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा की सालंकारिक नदियाँ प्रवाहित हैं।

संग्रह का शीर्षक 'विद्युल्लता' भी कौतुहल जगाता है। आकाशीय विद्युत चंचला भी होती है और अल्पजीवी भी। तो क्या कवि जीवन की क्षणभंगुरता की ओर संकेत करना चाहते हैं?

या विद्युल्लता पर खिले उन प्रकाश पुष्पों की कौंध पर जो आँखों से होकर सीधे मन में उतरती है। उस कौंध से दृष्टि प्रकाश से भर जाती है और हृदय भी; जो भी हो शीर्षक का चयन कवि का अपना अधिकार है।

इस संग्रह में भावपक्ष और कलापक्ष; कथ्य और शिल्प की दृष्टि से समृद्ध है। रचनाओं का प्रवाह और प्रभाव रसानुभूति के साथ बाह्य दृष्टि और अन्तर की शक्ति से परिचय करवाती है। यह नितान्त सत्य है कि संग्रह की हर एक कविता एक-एक शोध पत्र की क्षमता रखती है।

यह समीक्षा सीमा से बँधी है अतः मेरा मन थोड़ा खिन्न है। काश! मैं इस संग्रह की रचनाओं के साथ-साथ कवि के मन में बसे उन काल संस्कारों को भी पढ़ पाती जिसमें कविता के अंकुर जन्म लेते हैं।

अन्त में इस संग्रह की कविताओं के माध्यम से कवि श्री रामनारायण सोनी जी के विराट व्यक्तित्व और कृतित्व की जो छबि मेरे मन में बनी है उसे सादर को सश्रद्ध नमन करते हुए यह लघु समीक्षा पाठकों को सादर समर्पित है। इत्यलम्।

 

डॉ. जया पाठक

पूर्व प्राध्यापक (हिंदी)

उच्च शिक्षा भोपाल (मध्य प्रदेश)

 

जानकी मंगल भगत सिंह मार्ग

थांदला - जिला झाबुआ

मध्य प्रदेश 45777


 

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शुभकामना

 




आत्मीय बंधु/ भगिनी,

 

हर्ष के साथ अवगत कराने में आता है कि रामनारायण जी सोनी के 75 गीतों का नव संग्रह तैयार है। सद्य प्रकाश्य कृति अपने प्रकाशन के अंतिम चरण में है। आपसे प्राप्त सूचना से यह ज्ञात हुआ कि बहु प्रतीक्षित यह कृति अब छप कर हम सबके हाथों में आने वाली है तो मन की प्रसन्नता कई गुना बढ़ गई।

श्री रामनारायण सोनी जी की शिक्षा - बी.ई. इलेक्ट्रिकलसे हुई।

उनके लेखन कर्म में प्रकाशित पुस्तकें :- गद्य, कविता, गीत, आलोचना आदि विधाओं में लेखन के अतिरिक्त उन्होंने अनेक पुस्तकों का संपादन और अनुवाद भी किया है।

उन्हें "तुलसी अलंकरण", "साहित्य मनीषि" आदि सम्मान भी प्राप्त हुए हैं।

एक लंबे समय से आप लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। आपके परिश्रम की यह सुंदर परिणीति भी अप्रतिम बन पड़ी है इसमें कोई संशय नहीं। आपके लेखन के विषय चयन और प्रस्तुतियां पाठकों को लुभाएंगे।

स्वाभाविक रूप से इन दिनों लेखकों की मुख्य शिकायत यही है कि उन्हें सहज रूप से अच्छे पाठक नहीं मिल पाते। आपकी यह कृति संभवतः इस शिकायत को दूर करने में सक्षम सिद्ध होगी।

मैं आपके नवीन प्रकाशित ग्रंथ के लिए हृदय से शुभकामनाएं व्यक्त करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वह आपकी लेखनी को खूब सक्षम बनाएँ ताकि आप वर्षानुवर्ष तक लेखन धर्म में प्रवृत्त रह सकें।

पुनः बधाई और शुभकामनाओं सहित ...

 

सदैव सा

डॉ विकास दवे

निदेशक, साहित्य अकादमी,

मध्यप्रदेश शासन, भोपाल

 


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विद्युल्लता - सार्थक और दिशा बोधमय कृति


 


कविता न्यूनतम शब्दों में अधिकतम की अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ संसाधन होती है । कविता मन को एक साथ ही हुलास , उजास और सुकून देती है । नौकरी और साहित्य के मेरे समान धर्मी श्री रामनारायण सोनी के कविता संग्रह विद्युल्लता को पढ़ने का सुअवसर मिला । संग्रह में भक्ति काव्य की निर्मल रसधार का अविरल प्रवाह करती समय समय पर रची गई सत्तर कवितायें संग्रहित हैं । सभी रचनायें भाव प्रवण हैं । काव्य सौष्ठव परिपक्व है । सोनी जी के पास भाव अभिव्यक्ति के लिये पर्याप्त शब्द सामर्थ्य है । वे विधा में पारंगत भी हैं । उनकी अनेक पुस्तकें पहले ही प्रकाशित हो चुकी हैं , जिन्हें हिन्दी जगत ने सराहा है । सेवानिवृति के उपरांत अनुभव तथा उम्र की वरिष्ठता के साथ रामनारायण जी के आध्यात्मिक लेखन में निरंतर गति दिखती है । कवितायें बताती हैं कि कवि का व्यापक अध्ययन है , उन्हें छपास या अभिव्यक्ति का उतावलापन कतई नहीं है । वे गंभीर रचनाकर्मी हैं ।

सारी कवितायें पढ़ने के बाद मेरा अभिमत है कि शिल्प और भाव , साहित्यिक सौंदर्य-बोध , प्रयोगों मे किंचित नवीनता , अनुभूतियों के चित्रण , संवेदनशीलता और बिम्ब के प्रयोगों से सोनी जी ने विद्युल्लता को कविता के अनेक संग्रहों में विशिष्ट बनाया है । आत्म संतोष और मानसिक शांति के लिये लिखी गई ये रचनायें आम पाठको के लिये भी आनंद दायी हैं । जीवन की व्याख्या को लेकर कई रचनायें अनुभव जन्य हैं । उदाहरण के लिये "नेपथ्य के उस पार" से उधृत है ... खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं, इन मुखौटों के परे तुम कौन हो फिर देखते हैँ । जैसी सशक्त पंक्तियां पाठक का मन मुग्ध कर देती हैं । ये मेरे तेरे सबके साथ घटित अभिव्यक्ति है ।

संग्रह से ही दो पंक्तियां हैं ... " वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है , आज व्यथा को टांग अलगनी गाथा कोई गढ़नी है । " मोहक चित्र बनाते ये शब्द आत्मीयता का बोध करवाने में सक्षम हैं । रचनायें कवि की दार्शनिक सोच की परिचायक हैं ।

रामनारायण जी पहली ही कविता में लिखते हैं " तुम वरेण्य हो , हे वंदनीय तुम असीम सुखदाता हो .... सौ पृष्ठीय किताब की अंतिम रचना में ॠग्वेद की ॠचा से प्रेरित शाश्वत संदेश मुखर हुआ है । सोनी जी की भाषा में " ए जीवन के तेजमयी रथ अपनी गति से चलता चल , जलधारा प्राणों की लेकर ब्रह्मपुत्र सा बहता चल " ।

यह जीवन प्रवाह उद्देश्य पूर्ण , सार्थक और दिशा बोधमय बना रहे । इन्हीं स्वस्ति कामनाओ के साथ मेरी समस्त शुभाकांक्षा रचना और रचनाकार के संग हैं । मैं चाहूंगा कि पाठक समय निकाल कर इन कविताओ का एकांत में पठन ,मनन , चिंतन करें रचनायें बिल्कुल जटिल नहीं हैं वे अध्येता का दिशा दर्शन करते हुये आनंदित करती हैं ।

 

विवेक रंजन श्रीवास्तव

वरिष्ठ समीक्षक , कवि और व्यंग्यकार

सेवा निवृत मुख्य अभियंता

ए २३३ , ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , जे के रोड , भोपाल ४६२०२३

भोपाल दिनांक २१ जनवरी २०२४


 

मैं श्री रामनारायण सोनी जी की पुस्तक 'विद्युल्लता' की पाण्डुलिपि पढ़ रही थी इसमें पचहत्तर कविताएँ संग्रहित हैं। इसमें उन्होंने जीवन, अध्यात्म और कई सामयिक विषयों को करीब से छुआ है। निश्चित रूप से इन कविताओं में दार्शनिक अभिप्राय और जीवन के यथार्थ के दर्शन होते हैं। गीतों की श्रृंखला में "दो घूँट प्यार के ला देना, ऐ जिन्दगी तू कब गले मिली थी, जो मिल गया सम्हाल ले, तू कौन है विचार कर जैसी पंक्तियाँ जीवन की सच्चाई को उद्धाटित करती है। इस पुस्तक की प्रत्येक कविता बहुत सुन्दर है इन्हें जरूर जरूर पढ़ियेगा।

 

शुभकामनाओं सहित

अर्यमा सान्याल

पूर्व एयरपोर्ट डायरेक्टर

नोइडा, नई दिल्ली

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